Monday, November 06, 2017

Aapka Bhavishya aapki aaj ki soch aur Karyo pe nirbhar karta hai....

Maine Kahi Par Aisa Suna Aur Padha Hai Aur Apne Iss Jeevan Me Feel kiya Hai iske Baare me to aaj mai iss baat ko ek chhoti si kahani k madhyam se ap tak pahunchane ki kosis kar rha hu ......jarur padhiyega ise...

Ek aadmi ke 2 bete the, dono jab bade hue to 1 bahut bada business man bana aur 1 sharabi bana. Ek din unke kisi dost ne un dono se pucha ke tum itni sharaab kyon peete ho, to pehle bhai ne jawab diya “apne papa ke kaaran” main bachpan se hi apne pitaji ko sharab peete dekha hai aur jua khelte dekha hai isliye main bhi waisa hi ban gaya

To dost ne doosre bhai se pucha tum itne bade business man kaise ban gaye? To doosre bete ne kaha “apne papa ke kaaran” maine hamesha apne papa ko sharab ke nashe mein dhutt dekha, hamesha hi jua khelte dekha, ghar aur family ko support karte kabhi nahi dekha, bas ussi waqt se maine soch liya tha ke jo galtiya mere pitaji ne ki hai who maine bilkul bhi nahi karni hai, isliye aaj main itna kaamyab hoon.
To dosto is choti si kahani se humein bahut bada sabak (lesson) milta hai ke aap kis kaam ko kis nazariye se dekhte ho, ek bhai ne sharab aur jua dekha aur ussi se judd gaya, ek bhai ko yeh sab bura laga aur unse door raha aur kaamyaab ho gaya. Yeh sab insaan ke nazariye aur soch ka hi parinaam hai ke uska bhavishya kaisa banega.
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To dosto umeed hai is choti si kahani se aapke jeevan mein kafi kuch bada hoga jo aapko kaamyabi ke raste pe le jaayega aur aap bhi bulandiyo aur shohrat ko chu lauge. Jimmewari samjho, jimmewar bano, logo se acha behave karo, sabki suno, karo jo khud ko theek lage, sapne dekho tabhi sapne poore honge.

ACHA SOCHO, ACHA KARO….. SAB ACHA HI HOGA.

Aapke ache bhavishya ke liye meri vikas ki taraf se aapko dher sari shubhkaamnayein...

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Friday, September 08, 2017

परोपकार का महत्व

एक पुराने जंगल में शेर और शेरनी का एक जोड़ा रहता था। कुछ दिनों के बाद शेरनी ने दो सुन्दर बच्चों को जन्म दिया। एक बार की बात है, शेर और शेरनी दोनों बच्चों छोड़कर शिकार की तलाश में जंगल में दूर निकल गये। काफी देर हो जाने के कारण भूख से छोटे बच्चों का गला सूखने लगा। भूख के मारे वह बुरी तरह छटपटा रहे थे। उसी रास्ते से गुजरती हुई एक बकरी को उन बच्चों पर दया आ गई। भूख से तड़पते बच्चे बकरी से देखे नहीं गए और उसने सिंहों के बच्चों को अपना दूध पिला दिया।
दूध पीकर बच्चे ख़ुशी से आपस में खेलने लगे। तभी अचानक शेरों का जोड़ा वापस आया और उनकी नजर बकरी पर पड़ी। जैसे ही दोनों बकरी पर आक्रमण करने के लिए आगे बढे तो बच्चों ने चिल्लाकर बकरी का बचाव किया और कहा कि इसने हमें दूध पिलाकर हमपर बहुत बड़ा उपकार किया है अन्यथा हम लोग भूखों मर गए होते। बच्चों की बातें सुनकर शेर और शेरनी बहुत खुश हुए और उन्होंने बकरी का आभार व्यक्त करते हुए उसे धन्यवाद दिया और कहा कि “हम तुम्हारा ये उपकार कभी नहीं भूलेंगे, जाओ पुरे जंगल में आजाद होकर घूमो और मौज-मस्ती करो।”
बकरी अब पुरे जंगल में निडर होकर घूमती और शेरों के बच्चों के साथ भी खेलती थी। कभी-कभी तो वह शेरों की पीठ पर चढ़कर पेड़ों के पत्ते भी तोड़कर खाती थी। जंगल के अन्य जानवर भी बकरी के साथ अच्छा व्यौहार करने लगे थे। एक बाज कई दिनों से बकरी को देख रहा था, वह बकरी और शेर को एक साथ ख़ुशी से रहते देखकर बहुत ही आश्चर्यचकित था। अंत में उससे रहा नहीं गया और आखिर एक दिन उसने बकरी से इसका कारण पूंछ ही लिया। बकरी ने बाज से सारा कुछ विस्तारपूर्वक बताया कि पिछले दिनों किस तरह से उसके साथ सारी घटना घटित हुई। तब जाकर बाज को पता चला कि परोपकार का क्या महत्व होता है।
अगले ही दिन बाज उड़ान भर रहा था की उसने देखा कि चूहों के छोटे-छोटे बच्चे एक दलदल में फंसे हुए थे और पूरी कोशिश के बावजूद वह दलदल से नहीं निकल पा रहे थे। तभी बाज के दिमाग में भी बकरी वाली बात याद आयी और उसने सोचा चलो मैं भी इन चूहों पर एक प्रयोग करता हूँ। बाज ने उन सभी चूहों को दलदल से निकलकर सुरक्षित स्थान पर पंहुचा दिया। काफी देर तक भीग जाने के कारण वो सभी ठण्ड से काँप रहे थे। ठण्ड से बचाव के लिए बाज ने उन्हें अपने पँखों के नीचे छुपा लिया। चूहों ने काफी राहत महशूस किया।
कुछ समय बाद जब बाज उड़कर वहां से जाने लगा तो उसे उड़ने में दिक्कत महशूश हुई, बाज की उड़ान पहले जैसे नहीं थी, क्योंकि चूहों के बच्चों ने उसके पंख कुतर डाले थे। बाज तुरंत बकरी के पास गया और उसने अपनी आप बीती बकरी को सुनाई। उसने बकरी से कहा, “तुमने भी परोपकार किया था और मैंने भी उपकार किया है लेकिन हम दोनों को परोपकार का फल अलग-अलग क्यों ?”
बकरी ने हंसकर गंभीरता के साथ उत्तर दिया, “उपकार हमेशा उन्हीं पर करो जो उपकार को समझें।” अर्थात बहादुर लोग (शेर) दूसरों द्वारा किये गए परोपकार को कभी नहीं भूलते हैं, जबकि कायर लोग (चूहे) अक्सर उपकार भूलकर धोका देते हैं।
ठीक उसी प्रकार जैसे पिछले वर्ष कश्मीरियों को सेना ने बाढ़ में डूबने से बचाया था और आज वो ही एहसान फरामोश सेना पर पत्थर फेंक रहे हैं।

Tuesday, August 22, 2017

आप किसे लिफ्ट देना चाहेंगे.....???

एक कंपनी में जॉब के लिए इंटरव्यू होने वाले थे. बहुत सारे आवेदक अपने तमाम योग्यताओं के प्रमाणपत्र लिए इंटरव्यू शुरू होने का इंतज़ार कर रहे थे. वे अपने अपने विषय की अच्छी तैयारी करके आये थे और अपनी सफलता को लेकर पूरे आशान्वित थे. लेकिन आज का इंटरव्यू कुछ अलग प्रकार का होने वाला था.

घंटी बजी और चपरासी ने सबसे पहले उम्मीदवार को इंटरव्यू कक्ष में भेजा. साक्षात्कारकर्ता ने युवक को सामनेवाली कुर्सी पर बिठाया और और उसकी फाइल देखने के बाद बोला, “आपकी क्वालिफिकेशन बहुत अच्छी हैं लेकिन आप मेरे एक सवाल का जवाब दीजिये.”

“मान लीजिये आप कहीं जा रहे हैं, आपकी कार टू सीटर है. आगे चलने पर एक बस स्टैंड पर आप देखते हैं कि तीन व्यक्ति बस के इंतजार में खड़े है. उन में से एक वृद्धा जो कि करीब 90 वर्ष की है तथा बीमार है. अगर उसे अस्पताल नहीं पहुँचाया गया तो इलाज न मिल सकने के कारण मर भी सकती है. दूसरा आपका एक बहुत ही पक्का मित्र है जिसने आपकी एक समय बहुत मदद की थी. तीसरी आपकी प्रेमिका है जिसे आप बेहद प्रेम करते है. अब आप उन तीनो में से किसे लिफ्ट देंगे क्यूंकि आपकी कार में केवल एक ही व्यक्ति आ सकता है ?”
युवक ने एक पल सोचा फिर जवाब दिया ”सर मैं प्रेमिका को लिफ्ट दूंगा.“
साक्षात्कारकर्ता ने हैरानी से पूछा, “क्या ये बाकी दोनों के साथ अन्याय नहीं होगा ?”
युवक ने जवाब दिया, “नो सर, वृद्धा तो आज नहीं तो कल मर ही जायेगी. दोस्त को मैं बाद में भी मिल सकता हूँ पर अगर मेरी प्रेमिका एक बार चली गई तो फिर मैं उससे दूबारा कभी नहीं मिल सकूंगा.”
साक्षात्कार लेने वाले ने मुस्कुरा कर कहा – “वेरी गुड में तुम्हारी साफगोई सुन कर प्रभावित हुआ. अब आप जा सकते है.”
“थैंक यू” कहकर युवक कमरे से बाहर निकल गया.
इसके बाद अन्य प्रत्याशियों का नंबर आया. साक्षात्कार लेने वाले ने सभी से यही सवाल पूछा. सभी ने इसके विभिन्न उत्तर दिए. किसी ने वृद्धा को लिफ्ट देने की बात कही तो किसी ने दोस्त को लिफ्ट देने की बात कही. इस तरह इंटरव्यू आगे चलता रहा.
जब एक प्रत्याशी से यही प्रश्न पूछा तो उसने उत्तर दिया “सर मैं अपनी कार की चाभी अपने दोस्त को दूंगा और उससे कहूंगा कि वो मेरी कार में वृद्धा को लेकर उसे अस्पताल छोड़ता हुआ अपने घर चला जाये. मैं उससे अपनी कार बाद में ले लूंगा और स्वयं अपनी प्रेमिका के साथ टैक्सी में बैठ क़र चला जाऊँगा.
यह जवाब सुनकर इंटरव्यू लेने वाले अधिकारी ने उठकर उससे हाथ मिलाया और कहा, “गुड आंसर, यू आर सिलेक्टेड !”
युवक ने ‘थैंक यू सर’ कहा और मुस्कुराता हुआ बाहर आ गया.
साक्षात्कार समाप्त हो चुका था.
कई बार हम अपने सामने उपस्थित समस्या के एक ही पहलू को देखकर उसका हल खोजने लगते हैं जबकि उसका हल उसके सभी पहलुओं को एक साथ देखने और समझने में छुपा होता है. जीवन में किसी एक को साथ लेकर चलने के बजाय सभी को साथ लेकर चलने को प्राथमिकता देनी चाहिए.


Saturday, August 05, 2017

सच्ची दोस्ती.........On Siddhant@Live

Iss Friendship day Par ek Visesh Yojna k sath kaam kiya Hai....

कौन कहता है कि
दोस्ती बराबरी में होती है
सच तो ये है
दोस्ती में सब बराबर होते है..!!


दो मित्र थे. वे बहुत ही बहादुर थे. उनमें से एक ने सभा के दौरान अपने राजा के अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाई. राजा बहुत ही कठोर और निर्दयी था. स्वयं के प्रति बगावत का सुर सुनते ही राजा ने उस नौजवान को फांसी के तख्ते पर लटकाने की आज्ञा दी.
नौजवान ने राजा से विनती कि – “आप जो कर रहे हैं वह ठीक हैं. मैं खुशी से मौत की गोद में चला जाऊंगा, लेकिन आप मुझे कुछ देर कि मोहलत दे दीजिए, जिससे मैं गांव जाकर अपने बच्चों से मिल आऊं.”
राजा ने कहा – “नहीं, मैं तुम्हारी बात पर कैसे विश्वास करू?”
उस नौजवान का मित्र वहां मौजूद था. वह आगे आकर बोला – “मैं अपने इस दोस्त की जमानत देता हूं, अगर यह लौटकर न आए तो आप इसके बदले मुझे फांसी पर चढ़वा देना.”
राजा आश्चर्यचकित रह गया. उसने अपने जीवन में ऐसा कोई आदमी नहीं देखा था, जो दूसरों के लिए अपनी जान देने को तैयार हो जाए.
राजा ने नौजवान कि याचना को स्वीकृति दी. उसे छ: घण्टे की मौहलत दी गई. नौजवान घोड़े पर सवार होकर अपने गांव को रवाना हो गया और उसके दोस्त को कारागाह में बंद कर दिया गया.
नौजवान ने हिसाब लगाकर देखा कि वह लगभग पांच घंटे में लौट आएगा, लेकिन बच्चों से मिलकर वापस आते वक्त उसका घोड़ा ठोकर खाकर गिर गया और घायल हो जाने के कारण फिर उठा ही नहीं. नौजवान के भी बहुत चोटें आई, पर उसने एक पल के लिए भी हिम्मत नहीं हारी.
छ: घण्टे का समय भी बीत गया. किंतु वह नौजवान नहीं लोटा, तो उसका दोस्त बहुत खुश हुआ. आखिर उसके लिए इससे बढ़कर क्या बात होती कि दोस्त-दोस्त के काम आए. वह निरंतर ईश्वर से प्रार्थना करने लगा कि उसका मित्र वापिस न लौटे. फाँसी का समय हो चुका था. मित्र को फांसी के तख्ते के पास लाया ही गया था कि नौजवान वहां पहुंच गया.
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नौजवान ने अपने दोस्त से कहा – “लो मैं आ गया. अब मुझे विदा दो और तुम घर जाओं.”
दोस्त ने कहा – “यह नहीं हो सकता. तुम्हारी मियाद पूरी हो गई.”
नौजवान ने कहा – “यह तुम क्या कह रहे हो! सजा तो मुझे मिली है.”
दोनों मित्रों की दोस्ती को राजा बड़े गौर से देख रहा था. राजा का मन भी पिघल गया, उसकी आंखें भर आईं. उसने उन दोनों को बुलाकर कहा – “तुम्हारी दोस्ती ने मेरे दिल पर गहरा प्रभाव डाला है. जाओ, मैनें तुम्हें माफ किया”
उस दिन से राजा ने कभी किसी पर अत्याचार नहीं किया......

Happy friendship Day To all Of You

Tuesday, July 18, 2017

ज़िन्दगी संघर्ष है !

एक बार किसी जगह पर एक पिता अपनी बेटी के साथ रहता था। दोनों में काफी प्यार था और दोनों काफी मिलजुलकर रहते थे। एक दिन बेटी ने अपने पिता से शिकायत करने लगी कि उसकी ज़िन्दगी बहुत ही उलझी हुयी है। और कहने लगी “मैं बहुत थक गयी हूँ अपनी ज़िन्दगी से लड़ते-लड़ते। जब भी कोई एक परेशानी खत्म होती है तो दूसरी शुरू हो जाती है। कब तक लड़ती रहूंगी इन सब से।” वह काफी परेशान लग रह रही थी।
यह सब सुनके पिता ने कहा मेरे साथ आओ, और रसोई में चले गए। बेटी भी अपने पिता के कहे अनुसार रसोई में अपने पिता के सामने खड़ी हो गयी। उसके पिता ने बिना कुछ कहे तीन बर्तनों में पानी भरकर अलग अलग चुल्हों पर उबालने रख दिया। एक बर्तन में आलू, एक में अण्डे और एक में coffee bean के टुकड़े डाल दिए। और बिना कुछ कहे बैठ के बरतनों को देखने लगे।
20 मिनट के बाद उसने चुल्हे बंद कर दिए। एक प्लेट में आलू, एक में अण्डे और एक कप में कॉफ़ी रख दी। और अपनी बेटी की तरफ घूमकर पूछा – तुमने क्या देखा?
बेटी ने हंसकर जवाब – आलू, अण्डे और कॉफ़ी।
पिता ने कहा – और नज़दीक से छूकर देखो।
बेटी ने आलू छूकर देखे तो महसूस किया वो काफी नरम हो चुके थे।
पिता ने फिर कहा – अब अंडे को छीलकर देखो।
बेटी ने वैसा ही किया और देखा अंदर से भी अण्डे सख्त हो चुके थे।
आखिर में पिता ने कॉफ़ी कप पकड़ाते हुए कहा अब इसे पियो।
बेटी ने कॉफ़ी पी। और कॉफ़ी की इतनी प्यारी महक से उसके चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी।
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उसने बड़े उत्सुकता के अपने पिता से पूछा – इन सब चीज़ों का क्या मतलब है?
इसपर उसके पिता ने समझाया। आलू, अण्डे और कॉफ़ी तीनो एक ही परिस्थिति से गुजरे थे, तीनों को एक जैसे ही उबाला था। परन्तु जब बाहर निकाला तो तीनों की प्रतिक्रिया अलग-अलग थी। जब हमने आलू को उबालने रखा था तो वो बहुत सख्त था परन्तु उबालने के बाद वो नरम हो गया।
जब अण्डे को रखा था तब वो अन्दर से पानी की तरह तरल था परन्तु उबालते ही सख्त हो गया।
उसी तरह जब कॉफ़ी के दानों को डाला था तब वो सब अलग-अलग थे मगर उबालते ही सब आपस में घुल गए और पानी को भी अपने रंग में रंग दिया।
ठीक इसी तरह ज़िन्दगी में भी अलग-अलग परिस्थितियां आती है। जब आपको खुद ही फैसला करना होता है कि आपको किस परिस्थिति को कैसे सम्भालना है।
दोस्तों परेशानियाँ हर किसी के साथ आती हैं। परन्तु इनका हल निकालने का तरीका ढूँढना चाहिए। इनसे हार मान के खुद के मनोबल को गिराना सही नहीं है।

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Tuesday, December 27, 2016

अक्षरधाम मंदिर का इतिहास |

Doston Aaj mai apse share  kar rha hu Bhartiy Sanskriti ki Ek anmol Dharohar K baare me NOW GOING BACK TO DELHI INDIA...

दिल्ली शहर लोगो को आकर्षित करने वाला शहर है, यहाँ की संस्कृति और धर्म दोनों ही लोगो को आकर्षित करते है। आकर्षण की एक और वजह यहाँ बना अक्षरधाम मंदिर – Akshardham Temple भी है जो स्वामीनारायण मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। यह मंदिर विश्व के विशालकाय मंदिरों में से यह एक है। इसका विशाल आर्किटेक्चर इसके इतिहास को बयाँ करता है। आइये इस मनमोहक और विशाल मंदिर की कुछ बातो को जानते है –


अक्षरधाम या स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर एक हिन्दू मंदिर है और भारत के नयी दिल्ली में स्थापित साहित्यिक-सांस्कृतिक स्थान है। यह मंदिर दिल्ली अक्षरधाम या स्वामीनारायण अक्षरधाम के नाम से भी जाना जाता है। इस मंदिर में लाखो हिन्दू साहित्यों और संस्कृतियों और कलाकृतियों को मनमोहक अंदाज़ में दर्शाया गया है।

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दिल्ली में आने वाले 70% यात्रियों को अक्षरधाम मंदिर आकर्षित करता है। इस मंदिर को डॉ.ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने 6 नवम्बर 2005 को शासकीय रूप से खोला था। यह मंदिर यमुना के तट पर बना हुआ है और 2010 में खेले जाने वाले कामनवेल्थ गेम्स भी दिल्ली के इसी भाग में खेले गए थे। कॉम्प्लेक्स के बीच में बना यह मंदिर वास्तु शास्त्र और पंचरात्र शास्त्र के अनुसार बना हुआ है।
इस कॉम्प्लेक्स में अभिषेक मंडप, सहज आनंद वाटर शो, थीम गार्डन और तीन प्रदर्शनी (Exhibition) सहजआनंद दर्शन, नीलकंठ दर्शन और संस्कृति दर्शन है। स्वामीनारायण में हिन्दुओ के अनुसार अक्षरधाम शब्द का अर्थ भगवान के घर से है और भगवान के भक्तो का ऐसा मानना है की अक्षरधाम भगवान का निवास स्थान हुआ करता था।

स्वामीनारायण अक्षरधाम कॉम्प्लेक्स का मुख्य आकर्षण अक्षरधाम मंदिर है। यह 141 फूट (43 मी.) ऊँचा, 316 फूट (96 मी.) फैला और 356 फूट लंबा (109 मी.) है। यह जटिलतापूर्वक इसे फूलो, पशु, नर्तको, संगीतकारों और अनुयायियों से सजाया गया है।
महर्षि वास्तु आर्किटेक्चर के अनुसार ही इसे डिजाईन किया गया है। इसे मुख्य रूप से राजस्थानी गुलाबी पत्थरो से और इतालियन कार्रारा मार्बल से बनाया गया। इसका निर्माण हिन्दू शिल्प शास्त्र के अनुसार ही किया गया है और साथ ही दुसरे इतिहासिक हिन्दू मंदिरों की तरह ही इसमें भी मेटल का उपयोग नही किया गया है। इसे बनाते समय स्टील और कोंक्रीट का उपयोग भी नही किया गया।
इस मंदिर में 234 आभूषित किये हुए पिल्लर, 9 गुम्बद और 20000 साधुओ, अनुयायियों और आचार्यो की मूर्तियाँ है। मंदिर के निचले भाग में गजेन्द्र पीठ भी है और हाथी को श्रधांजलि देने वाला एक स्तम्भ भी है और हिन्दू साहित्य और संस्कृति में इसे बहुत महत्त्व दिया जाता है। इसमें 148 विशाल हाथी बनाये गए है जिनका वजन तक़रीबन 3000 टन होगा।
मंदिर के बीच के गुम्बद के निचे 11 फूट (3.4 मी) ऊँची स्वामीनारायण भगवान की अभयमुद्रा में बैठी हुई मूर्ति है। स्वामीनारायण मंदिर जातिगत गुरुओ के विचारो की प्रतिमाओ से घिरा हुआ है। स्वामीनारायण में बनी हर एक मूर्ति हिन्दू परंपरा के अनुसार पञ्च धातु से बनी हुई है। इस मंदिर में सीता-राम, राधा-कृष्णा, शिव-पार्वती और लक्ष्मी-नारायण की मूर्तियाँ भी है।

अक्षरधाम मंदिर के पीछे संस्था BAPS का हात है, जिसका अर्थ बोचासनवासी श्री अक्षर पुरुषोत्तम स्वामीनारायण संस्था से है। इसके प्रमुख स्वामी महाराज ने मंदिर को बनाने में मुख्य भूमिका निभाई है।
आज अक्षरधाम मंदिर दिल्ली शहर का मुख्य आकर्षण केंद्र बन चूका है और वर्तमान में अक्षरधाम मंदिर के बिना दिल्ली शहर की कल्पना करना मुश्किल ही नही नामुमकिन है।
भारत में अक्षरधाम मंदिर जैसे बहोत से इतिहासिक मंदिर बने हुए है, आज यही मंदिर भारत के इतिहासिक और इतिहासिक कलाकृतियों की बयाँ करते है। हमें भारत के इन मंदिर पर हमेशा गर्व होना चाहिए और गर्व होना चाहिए की आज भी हम एक ऐसे देश में रहते है जहाँ के लोग सदियों पुरानी परम्पराओ को आज भी मानते है।

अक्षरधाम मंदिर की कुछ रोचक बाते –Interesting Facts About Akshardham Temple In Delhi
1. अक्षरधाम मंदिर का एक और आकर्षण गार्डन ऑफ़ इंडिया है, मुख्य रूप से यह मंदिर के क्षेत्र में बना हरा लॉन है। इस गार्डन में बहुत सी कांसे की मूर्तियाँ बनी हुई है जो देश के कुछ महापुरुषों को श्रधांजलि देते हुए नजर आते है जैसे सैनिक, बाल हीरो और महान महिलाये और महापुरुष देशभक्त।
2. अक्षरधाम मंदिर की मुख्य ईमारत एक सरोवर से घिरी हुई है जिसे नारायण सरोवर कहा जाता है, जिसमे देश की तक़रीबन 151 विशाल सरोवर और नदियों का पानी भरा हुआ है। सरोवर के पास ही में 108 गौमुख भी बने हुए है और माना जाता है की यह 108 गौमुख 108 हिन्दू भगवान का प्रतिनिधित्व करते है।
3. इस सुन्दर और मनमोहक मंदिर में आकर्षित करने वाला एक म्यूजिकल फाउंटेन शो भी है। यह शो हर शाम 15 मिनट तक होता है। इस शो में जीवनचक्र भी दिखाया जाता है, जो इंसान के जन्म से शुरू होता है और मृत्यु पर खत्म होता है, इसे दिखाते समय ही म्यूजिकल फाउंटेन का उपयोग किया जाता है।
4. अक्षरधाम मंदिर में एक और आकर्षित गार्डन है जिसे कमल बाग़ भी कहा जाता है, इसका नाम इसके आकार के आधार पर ही रखा गया है। यह गार्डन पवित्रता का स्वरुप है। कहा जाता है की इतिहास के कई महापुरुष, दर्शनशास्त्री और वैज्ञानिक इस गार्डन में आये थे।
5. गिनीज बुक और वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी अक्षरधाम मंदिर का नाम शामिल है। अक्षरधाम मंदिर को विश्व का सबसे विशाल हिन्दू मंदिर माना जाता है। इस मंदिर की एक और विशेष बात यह है की इसे बनाने में सिर्फ पाँच साल का समय लगा था, यह निश्चित ही आश्चर्यदायक बात है। तक़रीबन 11000 कलाकारों और अनगिनत सहयोगियों ने मिलकर इस विशाल मंदिर का निर्माण किया था, नवम्बर 2005 में इस मंदिर की स्थापना की गयी थी।
6. अक्षरधाम में दर्शनार्थियों के आकर्षण के लिए बहोत से आकर्षण है। इस मंदिर में बहोत सी इमारते और आकर्षित स्तम्भ बने हुए है। जो भारतीय इतिहास की महानता और संस्कृति को दर्शाते है। इस मंदिर में एक फिल्म स्क्रीन भी लगी हुई है जिसमे भगवान स्वामीनारायण के जीवन पर आधारित फिल्म दिखायी जाती है।
7. अक्षरधाम मंदिर में यग्नपुरुष कुण्ड भी है, जिसे विश्व का शबे बड़ा कुण्ड भी कहा जाता है। कमल के आकार में बने इस कुण्ड में 108 छोटे तीर्थस्थान और 2870 सीढियाँ बनी हुई है। कहा जाता है की इस कुण्ड का आकार ज्योमेट्री के हिसाब से एकदम परफेक्ट है। और यह कुण्ड भारतीय इतिहास के महान गणितग्यो की महानता को दर्शाता है।





Monday, November 14, 2016

पंडित जवाहरलाल नेहरु जीवनी | Jawaharlal Nehru In Hindi

Doston Aaj ke Iss Vishes Divas Par Jo Ki 14 November hai Jise Chacha Nehru ke NAAM sE jANA jata hai unke baare me likh rha hu Pt. JAWAHAR LAL NEHRU....

आज़ादी के लिये लड़ने वाले और संघर्ष करने वाले मुख्य महापुरुषों में से जवाहरलाल नेहरु एक थे, वे पंडित जवाहरलाल नेहरु – Pandit Jawaharlal Nehru के नाम से जाने जाते थे, जिन्होंने अपने भाषणों से लोगो का दिल जीत लिया था। इसी वजह से वे आज़ाद भारत के पहले प्रधानमंत्री भी बने और बाद में उनकी महानता को उनकी बेटी और पोते ने आगे बढाया। इस महान महापुरुष के जीवन के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी :
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पूरा नाम  :  जवाहरलाल मोतीलाल नेहरु
जन्म      : 14 नव्हंबर 1889
जन्मस्थान : इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश)
पिता      :  मोतीलाल नेहरु
माता      :  स्वरूपरानी नेहरु
शिक्षा     :  1910 में केब्रिज विश्वविद्यालय के ट्रिनटी कॉलेज से उपाधि संपादन की. 1912 में ‘इनर टेंपल’ इस लंडन कॉलेज से बॅरिस्ट बॅरिस्टर की उपाधि संपादन की।
विवाह     :  कमला के साथ (1916 में)
जवाहरलाल नेहरु भारत के पहले प्रधानमंत्री और स्वतंत्रता के पहले और बाद में भारतीय राजनीती के मुख्य केंद्र बिंदु थे। वे महात्मा गाँधी के सहायक के तौर पर भारतीय स्वतंत्रता अभियान के मुख्य नेता थे जो अंत तक भारत को स्वतंत्र बनाने के लिए लड़ते रहे और स्वतंत्रता के बाद भी 1964 में अपनी मृत्यु तक देश की सेवा की। उन्हें आधुनिक भारत का रचयिता माना जाता था। पंडित संप्रदाय से होने के कारण उन्हें पंडित नेहरु भी कहा जाता था। जबकि बच्चो से उनके लगाव के कारण बच्चे उन्हें “चाचा नेहरु” के नाम से जानते थे।
वे मोतीलाल नेहरु के बेटे थे, जो एक महान वकील और राष्ट्रिय समाजसेवी थे। नेहरु ट्रिनिटी विश्वविद्यालय, कैंब्रिज से स्नातक हुए। जहा उन्होंने ने वकीली का प्रशिक्षण लिया और भारत वापिस आने के बाद उन्हें अल्लाहाबाद उच्च न्यायालय में शामिल किया गया। लेकिन उन्हें भारतीय राजनीती में ज्यादा रुचि थी और 1910 के स्वतंत्रता अभियान में वे भारतीय राजनीति में कम उम्र में ही शामिल हो गये, और बाद में भारतीय राजनीती का केंद्र बिंदु बने। 1920 में भारतीय राष्ट्रिय कांग्रेस में शामिल होकर उनके महान और प्रमुख नेता बने, और बाद में पूरी कांग्रेस पार्टी ने उन्हें एक विश्वसनीय सलाहकार माना, जिनमे गांधीजी भी शामिल थे। 1929 में कांग्रेस के अध्यक्ष के रूप में, नेहरु ने ब्रिटिश राज से सम्पूर्ण छुटकारा पाने की घोषणा की और भारत को पूरी तरह से स्वतंत्र राष्ट्र बनाने की मांग की। नेहरु और कांग्रेस ने 1930 में भारतीय स्वतंत्रता अभियान का मोर्चा संभाला ताकि देश को आसानी से आज़ादी दिला सके। उनके सांप्रदायिक भारत की योजना को तब सभी का सहयोग मिला जब वे राष्ट्रिय कांग्रेस के मुख्य नेता थे। इस से अलग हुई मुस्लिम लीग बहोत कमजोर और गरीब बन चुकी थी। उनके स्वतंत्रता के अभियान को तब सफलता मिली जब 1942 के ब्रिटिश भारत छोडो अभियान में ब्रिटिश बुरी तरह से पीछे रह गये और उस समय कांग्रेस को देश की सबसे सफल और महान राजनितिक संस्था माना गया था। मुस्लिमो की बुरि हालत को देखते हुए मुहम्मद अली जिन्नाह ने मुस्लिम लीग का वर्चस्व पुनर्स्थापित किया। लेकिन नेहरु और जिन्नाह का एक दुसरे की ताकत बाटने का समझौता असफल रहा और आज़ादी के बाद 1947 में ही भारत का विभाजन किया गया।
1941 में जब गांधीजी ने नेहरु को एक बुद्धिमान और सफल नेता का दर्जा दिया था उसी को देखते हुए आज़ादी के बाद भी कांग्रेस ने उन्हें ही स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री के रूप में चुना। प्रधानमंत्री बनने के बाद ही, उन्होंने नविन भारत के अपने स्वप्न को साकार करने के प्रयास किये। 1950 में जब भारतीय कानून के नियम बनाये गये, तब उन्होंने भारत का आर्थिक, राजनितिक और सामाजिक विकास शुरू किया। विशेषतः उन्होंने भारत को एकतंत्र से लोकतंत्र में बदलने की कोशिश की, जिसमे बहोत सारी पार्टिया हो जो समाज का विकास करने का काम करे। तभी भारत एक लोकशाही राष्ट्र बन पायेगा। और विदेश निति में जब वे दक्षिण एशिया में भारत का नेतृत्व कर रहे थे तब भारत के विश्व विकास में अभिनव को दर्शाया।
नेहरु की नेतागिरी में कांग्रेस देश की सबसे सफल पार्टी थी जिसने हर जगह चाहे राज्य हो या लोकसभा हो विधानसभा हो हर जगह अपनी जीत का परचम लहराया था। और लगातार 1951, 1957 और 1962 के चुनावो में जित हासिल की थी। उनके अंतिम वर्षो में राजनितिक दबाव (1962 के सीनों-भारत युद्ध में असफलता) के बावजूद वे हमेशा ही भारतीय लोगो के दिलो में बसे रहेंगे। भारत में उनका जन्मदिन “बालदिवस” के रूप में मनाया जाता है।
पंडित जवाहरलाल नेहरु उर्फ़ चाचा नेहरु ने अपने जीवन में कभी हार नहीं मानी थी। वे सतत भारत को आज़ाद भारत बनाने के लिए ब्रिटिशो के विरुद्ध लड़ते रहे। और एक पराक्रमी और सफल नेता साबित हुए। वे हमेशा गांधीजी के आदर्शो पर चलते थे। उनका हमेशा से यह मानना था की,
“असफलता तभी आती है जब हम अपने आदर्श, उद्देश और सिद्धांत भूल जाते है.”

एक नजर में जवाहरलाल नेहरु की जानकारी – Information Of Jawaharlal Nehru In Hindi

1912 में इग्लंड से भारत आने के बाद जवाहरलाल नेहरु इन्होंने अपने पिताजीने ज्यूनिअर बनकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में वकील का व्यवसाय शुरु किया।
1916 में राजनीती का कार्य करने के उद्देश से पंडित नेहरू ने गांधीजी से मुलाकात की। देश की राजनीती में भारतीय स्वतंत्र आंदोलन में हिस्सा लिया जाये, ऐसा वो चाहते थे।
1916 में उन्होंने डॉ.अॅनी बेझंट इनके होमरूल लीग में प्रवेश किया। 1918 में वो इस संघटने के सेक्रेटरी बने। उसके साथ भारतीय राष्ट्रीय कॉग्रेस के कार्य में भी उन्होंने भाग लिया।
1920 में महात्मा गांधी ने शुरु किये हुये असहयोग आंदोलन में नेहरूजी शामील हुये। इस कारण उन्हें छह साल की सजा हुयी।
1922 – 23 में जवाहरलाल नेहरूजी इलाहाबाद नगरपालिका के अध्यक्ष चुने गये।
1927 में नेहारुजीने सोव्हिएल युनियन से मुलाकात की। समाजवाद के प्रयोग से वो प्रभावित हुये और उन्ही विचारोकी ओर खीचे चले गए।
1929 में लाहोर में राष्ट्रिय कॉग्रेस के ऐतिहासिक अधिवेशन के अध्यक्ष चुने गये और इसी अधिवेशन में और इसी अधिवेशन कॉग्रेस ने पुरे स्वातंत्र्य की मांग की इसी अधिवेशन भारतको स्वतंत्र बनानेका निर्णय लिया गया और ‘संपूर्ण स्वातंत्र्य’ का संकल्प पास किया गया।
यह फैसला पुरे भारतमे पहुचाने के लिए 26 जनवरी 1930 यह दिन राष्ट्रीय सभा में स्थिर किया गया। हर ग्राम में बड़ी सभाओका आयोजन किया गया। जनता ने स्वातंत्र्य के लिये लढ़नेकी शपथ ली इसी कारन 26 जनवरी यह दिन विशेष माना जाता है।
1930 में महात्मा गांधीजीने सविनय अवज्ञा आंदोलन शुरु किया जिसमे नेहरुजीका शामील होना विशेष दर्जा रखता था।
1937में कॉग्रेस ने प्रातीय कानून बोर्ड चुनाव लढ़नेका फैसला लिया और बहुत बढ़िया यश संपादन किया जिसका प्रचारक भार नेहरुजी पर था।
1942 के ‘चले जाव’ आंदोलनको भारतीय स्वातंत्र्य आंदोलन में विशेष दर्जा है। कॉंग्रेस ने ये आंदोलन शुरु करना चाहिये इस लिये गांधीजी के मन का तैयार करने के लिए पंडित नेहरु आगे आये। उसके बाद तुरंत सरकारने उन्हें गिरफ्तार करके अहमदनगर के जैल कैद किया। वही उन्होंने ‘ऑफ इंडिया’ ये ग्रंथ लिखा।
1946 में स्थापन हुये भारत के अंतरिम सरकार ने पंतप्रधान के रूप नेहरु को चुना। भारत स्वतंत्र होने के बाद वों स्वतंत्र भारत के पहले पंतप्रधान बने। जीवन के आखीर तक वो इस पद पर रहे। 1950 में पंडित नेहरु ने नियोजन आयोग की स्थापना की।
Jawaharlal Nehru Book – क़िताबे  :-
1) आत्मचरित्र (1936) (Autobiography)
2) दुनिया के इतिहास का ओझरता दर्शन (1939) (Glimpses  Of World History)
3) भारत की खोज (1946) (The Discovery Of India) आदी।
Jawaharlal Nehru Award – पुरस्कार  :-
*1955 में भारत का सर्वोच्च नागरी सम्मान ‘भारत रत्न’ पंडित नेहरु को देकर उन्हें सम्मानित किया गया।
Jawaharlal Nehru – विशेषता :-
1) आधुनिक भारत के शिल्पकार।
2) पंडित नेहरु का जन्मदिन 14 नव्हंबर ये ‘बालक दिन’ के रूप में मनाया जाता है।
Jawaharlal Nehru Death – मृत्यु  :-  27 मई 1964 को यह महापुरुष सदा के लिये चला गया।
आधुनिक भारत के निर्माता एवं विश्व शांति के अग्रदूत के रूप में पं. जवाहरलाल नेहरु का नाम सदैव इतिहास में अमर रहेगा।

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